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ईंट-भट्ठा पर काम करके बन गई एमए की गोल्ड
ईंट-भट्ठा पर काम करके बन गई एमए की गोल्ड मेडलिस्‍ट,

रांची। संघर्षों और मुश्किलों से जूझ रहे किसी भी मेधावी को रांची के लापुंग प्रखंड के गोलइया गांव की मुन्नावती की कहानी प्रेरणा दे सकती है। यह कहानी एक ऐसी प्रतिभाशाली छात्रा की है जिसे शानदार एकेडमिक रिकार्ड और विलक्षण प्रतिभा की धनी होने के बावजूद गरीबी के कारण न सिर्फ बार-बार बीच में पढ़ाई छोडऩी पड़ी, बल्कि अपने और परिवार के भरण-पोषण के लिए ईंट भट्ठे में लंबे समय तक मजदूरी करनी पड़ी।

लंबे समय बाद अब उसका संघर्ष रंग लाया और मुन्नावती अब पिस्कानगड़ी स्थित राजकीयकृत प्लस टू उवि पिस्कानगड़ी की शिक्षिका बन गई है। शनिवार को उसे स्कूल में पदस्थापन का पत्र मिला तो वह न सिर्फ खुशी के मारे उछल पड़ी, बल्कि आंखें भी छलक पड़ीं। सर के ऊपर तह लगाकर एक के ऊपर एक कर दर्जनों ईंटें रखकर उसकी ढुलाई करते हुए व मजदूरी के अन्य काम करती दुबली-पतली मुन्नावती को देख आज से कुछ दिन पहले तक शायद ही कोई अंदाजा लगा सकता था कि ईंटें ढोने वाली यह युवती एमए संस्कृत की टॉपर और गोल्ड मेडलिस्ट है।

मुन्नावती कहती हैं कि वह गरीब परिवार से आती है, इसलिए मजदूरी करना हमारे लिए कोई अचरज भरा काम नहीं है। अब सफलता पूर्वक शिक्षिका के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहती हूं। जेएसएससी की पीजी ट्रेंड टीचर की नियुक्ति परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद अब उसकी वर्षों की मेहनत और संघर्ष को मुकाम मिल गया है।

मुन्नावती संस्कृत में रांची विश्वविद्यालय की टॉपर और गोल्ड मेडलिस्ट रह चुकी हैं। रांची विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के 2012 बैच में उसने 65.38 अंक प्रतिशत अंक हासिल किए थे। नवंबर 2013 में आयोजित दीक्षांत समारोह में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अपने हाथों से उसे गोल्ड मेडल दिया था। पदस्थापन पत्र लेने के बाद मुन्नावती ने कहा कि हौसला बुलंद रखें, सब संभव है। उसने मैट्रिक थर्ड डिविजन और इंटर केसीबी कॉलेज बेड़ो से सेकेंड डिविजन से पास किया था। इसके बाद केसीबी कॉलेज से ही स्नातक प्रथम श्रेणी से फिर आरयू से स्नातकोतर में गोल्ड मेडलिस्ट बनी।

मुन्नावती की दो बड़ी बहनें हैं जिनकी शादी हो चुकी है। एक भाई है। वह कहती हैं कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण 1998 में दसवीं की परीक्षा पास कर पढ़ाई छोडऩी पड़ी। तब से लेकर 2005 तक पढ़ाई से दूर रही। इसके बाद मजदूरी करने लगी। मजदूरी करते हुए उसने बेड़ो के करमचंद भगत कॉलेज में दाखिला लिया। और संस्कृत विषय से स्नातक की डिग्री हासिल की। इंटर में 55 प्रतिशत और स्नातक में उन्हें 61.5 प्रतिशत अंक मिला था। वह रांची विवि क्लास करने लापुंग गांव से आती थीं। रांची से लापुंग की दूर करीब 40 किमी है। बस उपलब्ध नहीं होने पर वह रिक्शा की मदद से 12 से 15 किमी की दूरी तय करती थीं।
(UPDATED ON JULY 23RD, 2019)