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RASIK GUPTA
अध्यापक देश के भविष्य का निर्माता है.


( रसिक गुप्ता )
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः ,
गुरुर साक्षात् परब्रह्मा , तस्मै श्रीगुरुवे नमः !!

जो लोग इस श्लोक का अर्थ नहीं जानते, उनकी जानकारी के लिए बताना ज़रूरी है कि सभी धर्म शास्त्रों में गुरु या कहें कि अध्यापक को ईश्वर से ऊपर का दर्जा दिया गया है. इसी लिए तो कबीर जी ने भी लिखा था, "गुरु गोबिंद दोउ खड़े, काके लागूं पाएं, बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दिया बताय".

कुछ ऐसी थी गुरु कि महिमा हमारे पुरातन भारत में. परन्तु आज हालात इसके बिलकुल विपरीत हैं. वो गुरु जो कभी अन्न के कुछ दानों या वस्त्र आदि से प्रसन्न हो जाया करते थे तथा अपना सारा ज्ञान सहर्ष ही अपने शिष्यों में बाँट दिया करते थे, आज वही गुरु स्कूल, कॉलेजों में कम और ट्यूशन सेंटर्स में ज़्यादा मन से पढ़ाते हैं. कारण, ट्यूशन से मोटी कमाई होती है. ऐसे में यदि अध्यापक कि गरिमा का पतन हुआ है तो इस के लिए कहीं न कहीं वो स्वयं भी दोषी हैं. मैं सारा दोष इन अध्यापकों को भी नहीं देता. बहुत से मामले ऐसे होते हैं जिन में वास्तव में अध्यापकों को प्राइवेट स्कूल या कॉलेज से बहुत कम वेतन मिलता है इस लिए अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए उन्हें ट्यूशन वर्क करना पड़ता है. परन्तु उन अध्यापकों का क्या जो सरकारी नौकरी करते हैं या बहुत अच्छे प्राइवेट स्कूल कॉलेजों में पढ़ाते हैं और मोटी तनख्वाह लेते हैं पर उस से भी उनका पेट नहीं भरता. क्या ये लोग पेरेंट्स के मन में अध्यापकों के प्रति कम होते आदर और मान सम्मान के लिए उत्तरदायी नहीं?

परन्तु जैसा कि कहा जाता है कि पांचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती, आज भी ऐसे बहुत से अध्यापक हैं जो पूरी ईमानदारी से विद्यार्थियों का भविष्य सवांरने में लगे हैं. दुःख तो इस बात का है कि कुछ लालची लोगों के चलते अकारण ही गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है और कई बार इन मेहनती अध्यापकों को भी वो मान सम्मान नहीं मिलता जिस के वो हकदार हैं. बहुत दुःख होता है जब आज स्कूलों में छोटे छोटे विद्यार्थियों से ये पूछा जाता है कि वो बड़े हो कर क्या बनना चाहेंगे तो हर विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज या आईएएस अफसर तो बनना चाहता है परन्तु कोई विरला ही अध्यापक बनने में रूचि दिखाता है. पेरेंट्स का रवैया भी कुछ कुछ ऐसा ही है. हर पैरेंट अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज या आईएएस अफसर इत्यादि बना कर तो प्रसन्न है परन्तु अध्यापक बना कर नहीं.

अध्यापक को देश के भविष्य का निर्माता कहा जाता है. आज फ़िनलैंड, इंग्लैंड, अमेरिका, जापान जैसे कई देश हैं जहाँ अध्यापकों को उच्चतम दर्जे कि सुविधाएँ एवं सम्मान प्राप्त है परन्तु भारत में स्थिति इसके एकदम विपरीत है. खास तौर पर अगर स्कूल के अध्यापकों कि बात करें तो सारा मामला समझ में आ जाता है. जब से सीबीएसई सहित देश के विभिन्न बोर्ड अवं अदालतों ने विद्यार्थियों के लिए शारीरिक दंड बैन किया है तब से विद्यार्थियों के मन में अध्यापकों का डर तो ख़त्म हुआ ही है परन्तु अधिकतम मामलों में विद्यार्थी अध्यापकों पर हावी भी होने लगे हैं. हाल फिलहाल में कुछ प्राइवेट और सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों द्वारा अध्यापकों से अभद्रता, मार पिटाई और यहाँ तक की चाकू और गोली काण्ड के मामले भी सामने आये हैं जो हमें ये सोचने पर विवश कर देते हैं कि कहीं इस विषय में हम से गलती तो नहीं हो गयी? खैर, इस विषय में मेरी राय औरों से जुदा नहीं है. में भी ये मानता हूँ कि विद्यार्थियों को शारीरिक दंड नहीं दिया जाना चाहिए परन्तु इस परिस्थिति में पेरेंट्स को अध्यापकों का पूरा साथ देना चाहिए और कम से कम घर पर बच्चों कि पढाई, उन के होमवर्क और उन के व्यव्हार और नैतिक गुणों के विकास कि पूरी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

बहुत से पेरेंट्स ऐसे हैं जिन का अपने बच्चों के व्यवहार पर बिलकुल भी नियंत्रण नहीं रहता. ऐसे में वो बच्चों में नैतिक गुणों के विकास के लिए पूर्ण रूप से अध्यापकों पर निर्भर रहते हैं. एक स्कूल प्रिंसिपल होने के नाते वर्षों से पेरेंट्स टीचर मीटिंग के दौरान में पेरेंट्स को ये कहते सुना है की हमारे बच्चे हमारी बात नहीं सुनते, हमारा कहना नहीं मानते. अब तो आप ही इन्हें सुधार सकते हो. और यदि दुर्भाग्यवश सम्पूर्ण प्रयास करने के बाद भी यदि अध्यापक उन बच्चों के व्यवहार में सुधार नहीं ला पाते तो उन्हीं पेरेंट्स को मैंने इस के लिए स्कूल और अध्यापकों को दोष देते भी देखा है. आज हालात ये हैं कि यदि कोई अध्यापक विद्यार्थी कि गलती पर उसे डांट दे तो उसे पेरेंट्स से ले कर प्रिंसिपल को जवाब देना पड़ता है और गलती से भी यदि बच्चे को एक आध चपत लगा दी तो फिर तो भगवान् ही मालिक है. पेरेंट्स, प्रिंसिपल, मैनेजमेंट से ले कर प्रेस, मीडिया और अदालतें तक उस अध्यापक को राक्षस और हैवान के रूप में प्रचारित कर देते हैं. बहुत से मामले ऐसे भी देखने में आये हैं कि जहाँ अध्यापकों ने कुछ बिगड़े हुए विद्यार्थियों को सुधरने कि कोशिश के परन्तु उन विद्यार्थियों ने बदला लेने के लिए अपने आप को चोट लगा ली और खुद ही प्रेस, मीडिया में चले गए ताकि वो अध्यापक अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे और उन का बदला पूरा हो जाये.

इतनी विकट परिस्थितियों से जूझ कर भी जो अध्यापक पूरी ईमानदारी से अपने दायित्व का भली भांति निर्वाह कर रहे हैं, इस अध्यापक दिवस पर वो सभी बधाई एवं सम्मान के पात्र हैं. इन्हीं कुछ अध्यापकों कि वजह से इस पद कि गरिमा कुछ हद तक कायम है. अन्य अध्यापकों को भी इन से सबक लेना चाहिए तथा केवल पैसे के पीछे भागना छोड़ कर ईमानदारी से अपने स्कूल और कॉलेज में अपने विद्यार्थियों को पढ़ाना चाहिए ताकि उन्हें ट्यूशन पर जाने कि आवश्यकता ही ना रहे और पेरेंट्स के मन में भी अध्यापकों के प्रति कम होता जा रहा सम्मान पुनः स्थापित हो सके. इस के आलावा अध्यापकों एवं पेरेंट्स के बीच में जो रिश्ता भूतकाल में हुआ करता था उसे भी पुनः स्थापित करने कि आवश्यकता है . इस के लिए हर अध्यापक को अपने हर विद्यार्थी के विषय में पूर्ण जानकारी रखनी चाहिए जैसे उस के माता पिता का नाम और व्यवसाय एवं उन कि पारिवारिक पृष्ठभूमि इत्यादि. अगर वो किसी कारणवश पढाई में ठीक से प्रदर्शन नहीं कर पा रहा या उस के व्यवहार में अचानक कुछ बदलाव देखने को मिलता है तो इस के पीछे के कारणों का पता करना चाहिए तथा उन कारणों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए. इस के लिए विद्यार्थी और उस के पेरेंट्स के साथ एक बेहतर संवाद स्थापित करने कि आवश्यकता है. ऐसे में पेरेंट्स और अध्यापक जितना अधिक एक दूसरे को विश्वास में लेंगे, विद्यार्थी के अंदर सद्गुणों का उतना ही बेहतर विकास होगा.

इन्हीं कुछ सुझावों के साथ आप सब को अध्यापक दिवस कि बहुत बहुत शुभकामनाएं. ईश्वर करे कि भारत में शिक्षा का स्तर जल्दी से जल्दी बेहतर हो जाये ताकि हमारी गिनती भी फ़िनलैंड जैसे देशों कि कतार में कि जाये.

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WRITER'S DETAILS
रसिक गुप्ता
प्रिंसिपल
दर्शन अकादमी सीबीएसई एफिलिएटेड स्कूल
दसुया, होशियारपुर, पंजाब
email. rasikgupa.jds@gmaiil.com
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(updated on 4th september 2018)


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" पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ रही कीमतें", कारण और समाधान.

-रसिक गुप्ता-
पेट्रोल और डीज़ल की कीमत हर रोज़ बढ़ रही है. जनता त्राहिमाम कर रही है. सरकार इस का ठीकरा अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर फोड़ रही है और विपक्षी पार्टियां कीमत घटा पाने में सरकार की विफलता को मुद्दा बना कर और जनता की भावनाओं को भड़का कर आने वाले चुनावों में अपनी सफलता का पैमाना तैयार कर रही हैं. ये समस्या जितनी दिखती है उस से कहीं ज़्यादा गंभीर है परन्तु दुःख की बात ये है की हमारी जनता के पास मुद्दों की गंभीरता को मापने का एक ही पैमाना है और वो है सोशल मीडिया. "व्हाट्सप्प और फेसबुक". और ये बात आज हर राजनितिक दल और राज नेता को पता है जिस की सहायता से वो अपनी सहूलियत के हिसाब से जनता की भावनाओं से खिलवाड़ कर लेते हैं.

इस की एक छोटी सी उदाहरण मैं आप से सांझी करता हूँ. आज कल एक मैसेज सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हो रहा है. वो है बत्ती गुल मीटर चालू फिल्म का एक सीन जिस में शाहिद कपूर बिजली के मीटर में जलने वाली छोटी सी बत्ती के बारे में अदालत में एक सच उजागर करते हैं की उस से बिजली कंपनी की कमाई कितनी हो रही है. बिजली कंपनी का मालिक ये बताता है की हर घर का प्रति दिन का खर्च 4 से 5 पैसे आता है. इस छोटी सी रकम को महीने भर के खर्च और उपभोक्ताओं की संख्या से गुना कर के शाहिद ये साबित कर देते हैं की बिजली कम्पनी इस छोटी सी बत्ती से हर महीने करोड़ों रूपए कमा रही है. फिर क्या था? जनता को वो मिल गया जिस का उसे इंतज़ार था. व्हाट्सप्प और फेसबुक पर फ़ैलाने के लिए मसाला. मैसेज को इस तरह से और इतनी ज़्यादा तादाद में शेयर किया गया जिस से हर व्यक्ति को ये लगा कि ये करोड़ों रूपए उस कि जेब से ही जा रहे हैं. बिना ये सोचे समझे कि 5 पैसे प्रति दिन के हिसाब से हर घर को महीने के केवल डेढ़ रुपये का भुगतान करना पड़ रहा है. जो कि कोई बहुत बड़ी कीमत नहीं है.

जिस चीज़ पर इस मैसेज में बहुत चालाकी से पर्दा डाल दिया गया वो है इस बत्ती कि वास्तविक आवश्यकता. औरों का तो पता नहीं परन्तु मेरे साथ अक्सर ये हुआ है कि कई बार ये शक होता है कि मीटर चल रहा है या नहीं. उस स्थिति में एहि टिमटिमाती बत्ती ही इस शक को दूर करती है. और तो और घर से बाहर जाते समय घर में कोई बत्ती जलती तो नहीं रह गयी इस बात को परखने में भी यही छोटी सी बत्ती सहायता करती है. और हाँ अगर घर में बिजली का ज़्यादा उपयोग हो रहा हो जैसे कि प्रेस , गीज़र या AC का तो इस बत्ती की टिमटिमाने कि बढ़ी हुई रफ़्तार हमें सचेत कर देती है. इतने फायदे हैं इस छोटी से बत्ती के परन्तु कितनी सफाई से इन सभी फायदों को गोल कर के केवल डेढ़ रुपये के लिए जनता कि भावनाओं को इतना भड़का दिया कि कई प्राइवेट बिजली कंपनियों के दफ्तरों में तोड़ फोड़ कि नौबत आ गयी . जब कि सच्चाई ये है कि ऐसी ही कई छोटी छोटी बत्तियां और इंडिकेटर हमारे घर के स्विच बोर्ड और कई उपकरणों में लगे रहते हैं जिन का उपयोग और खर्च भी इस बत्ती जैसा ही है.

आप सोच रहे होंगे कि बात पेट्रोल और डीजल से शुरू हुयी थी पर कहीं गुप्ता जी रह तो नहीं भटक गए. चिंता मत कीजिये. इस घटना का पेट्रोल कि बढ़ती कीमतों और उन पर काबू पाने में बहुत सम्बन्ध है. पहला तो ये कि सोशल मीडिया पर फॉरवर्ड किये हर मैसेज पर बिना पूरी सच्चाई जाने न तो खुद भड़कना चाहिए और न ही किसी और को भड़काना चाहिए. दूसरा ये कि डेढ़ रुपये के पीछे सोशल मीडिया पर भूचाल ला देने वाले हर व्यक्ति को वो सभी विज्ञापन एक बार फिर याद करने चाहिए जिन में लाल बत्ती पर वाहन का इंजन बंद करने कि सलाह दी जाती है ताकि पेट्रोल और डीज़ल कि बचत हो सके. एक सर्वेक्षण के अनुसार लाल बत्ती पर अकेली देश कि राजधानी दिल्ली में ही प्रतिदिन करोड़ों रुपये के पेट्रोल और डीज़ल कि बर्बादी हो जाती है. प्रति व्यक्ति हिसाब लगाएंगे तो डेढ़ रुपये से कहीं ज़्यादा पैसों कि बर्बादी हर रोज़. अब इस के लिए किस बिजली कंपनी को दोष दिया जाये? क्या इस पर सोशल मीडिया पर कोई मैसेज वायरल किया जायेगा? शायद नहीं. क्योंकि इस मैसेज को वायरल करने पर वो आग नहीं लगेगी जिस पर राजनीती कि रोटियां सकी जा सकें.

पेट्रोल डीज़ल कि कीमत आज के समय में वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं कि वजह से बढ़ रही है जैसे ईरान पर अमरीका के प्रतिबन्ध और ओपेक देशों द्वारा कच्चे तेल का कम उत्पादन. उस से भी ज़्यादा नुक्सान डॉलर के प्रति घटती जा रही रुपये की कीमत ने किया है क्योंकि भारत अपनी ज़रूरत का लगभग सारा तेल विदेशों से खरीददता है जिस के लिए भुगतान डॉलर में करना पड़ता है रुपये में नहीं. मुझे विशवास है कि 80 % जनता को तो इस सब कि जानकारी भी नहीं होगी. फिर भी हर कोई पेट्रोल और डीज़ल कि बढ़ रही कीमतों पर अपना आधा अधूरा ज्ञान बांचने में लगा है. और तो और एक शाश्वत सत्य ये भी है कि क्यों कि हम पेट्रोल और डीज़ल का उपयोग बहुत ज़्यादा करते हैं और उस पर नियंत्रण नहीं करते इस का फायदा ईरान जैसे देश उठाते हैं और हमें स्पेशल एशिया टैक्स लगा कर और देशों से महंगा तेल बेचते हैं क्योंकि उन को भी हमारी इस कमज़ोरी के बारे में भली भांति पता है.

अक्सर जब प्याज़ और टमाटर कि कीमतें बढ़ने लगती हैं तो एक और मैसेज सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है और वो है कि जापान के लोग किस तरह बढ़ रही कीमतों को नियंत्रण में करते हैं. कहते हैं कि जापान कि जापान में जब किसी चीज़ कि कीमत बढ़ जाती है तो वहां के लोग उस चीज़ का कुछ दिनों तक उपयोग बंद कर देते हैं. मरता क्या न करता, कुछ दिनों में व्यापारियों को अक्ल आ जाती है और बढ़ी हुयी कीमतें नियंत्रण में आ जाती है. मैं कोई अर्थशास्त्री तो नहीं हूँ परन्तु अर्थशास्त्र का एक साधारण सा नियम भली भांति जनता हूँ. जिसे डिमांड और सप्लाई का रूल कहते हैं. इस के अनुसार यदि किसी चीज़ कि पैदावार ज़्यादा हो और मांग कम तो उस कि कीमत कम हो जाती है परन्तु इस के विपरीत यदि किसी चीज़ कि मांग ज़्यादा हो और पैदावार कम तो उस कि कीमत बढ़ जाती है. इस सब में एक बात तो साफ़ हो जाती है कि यदि हम पेट्रोल और डीज़ल कि खपत और मांग घटा दें तो इन कि कीमतों में कमी लायी जा सकती है. ये सब से छोटा प्रयास है जो जनता के स्तर पर हम कर सकते हैं और हमें करना भी चाहिए. परन्तु बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधेगा?? यहाँ तो एक दूसरे से बढ़ कर पेट्रोल और डीज़ल कि बर्बादी करने कि होड़ लगी रहती है. एक एक घर में पांच लोग पांच अलग अलग वाहन रखते हैं और कई बार एक ही जगह जाना हो तो उस के लिए भी अलग अलग वाहन का प्रयोग करते हैं. एक ही कॉलोनी से एक ही दफ्तर में जाने वाले 4 लोग भी झूठी शान का दिखावा करने के लिए कारपूलिंग नहीं करेंगे. मुझे तो भविष्य कि चिंता सताती है जब पेट्रोल और डीज़ल धरती के नीचे समाप्त हो जायेगा (जो कि अवश्यम्भावी है) तब हमारे ये वाहन टिन के डब्बे मात्र रह जायेंगे. ऐसी स्थिति में जो लोग मोहल्ले के मोड़ पर जाने के लिए भी कार या बाइक का प्रयोग करते हैं उन का क्या होगा?

जैसे जैसे धरती के नीचे कच्चा तेल समाप्त होता जायेगा, वैसे वैसे ही उस कि कीमतें भी बढ़ती जाएंगे. अभी 100 रुपये प्रति लीटर का सोच कर डर लगता है तो जब ये 1000 रूपए और ,10000 रूपए लीटर हो जायेगा तो हम क्या करेंगे? कुछ लोग अभी भी नहीं समझेंगे और कहेंगे कि हमारे पास तो करोड़ों रुपये हैं और हम तो 100000 रुपये लीटर भी पेट्रोल डलवा सकते हैं. पर वो मुर्ख ये नहीं जानते कि जब कच्चा तेल ख़त्म हो जायेगा तो चाहे वो एक करोड़ रूपया भी देंगे तो एक बून्द पेट्रोल भी नहीं मिलेगा. ज़रूरत है अभी से समझदारी दिखने कि और वाहनों में वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग करने की जैसे सौर ऊर्जा अथवा विद्युत् ऊर्जा. इस से भी बढ़ कर ज़रूरत है इन वाहनों पर अपनी निर्भरता घटाने की. जहाँ तक हो सके पैदल चलने की आदत डालें या साइकिल का उपयोग करें. पेट्रोल बचेगा और ज़्यादा देर चलेगा, जेब पर बोझ नहीं पड़ेगा और सब से बढ़ कर सेहत भी ठीक रहेगी और कई बिमारियों से भी बचेंगे.

लेकिन ऊपर दी गयी सलाह किसी भी तरह से सरकार को दोष मुक्त करने का प्रयास नहीं है. सरकार को भी अपनी ज़िम्मेदारिओं का एहसास करवाना ज़रूरी है. जब कच्चे तेल के दाम 100 प्रति बैरल से घट कर 30 डॉलर पर आ गए थे तो सरकार ने लगातार कई बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ा कर उस का सीधा लाभ जनता तक नहीं पहुँचने दिया. इस से सरकार की आमदनी काफी हद तक बढ़ गयी. परन्तु आज जब कच्चे

तेल के दाम बढ़ रहे हैं तो सरकार की ये ज़िम्मेदारी बनती है की उसी अनुपात में एक्साइज ड्यूटी घटा कर कीमतों को स्थिर करे और जनता को कुछ समय तक वो इन बढ़ रही कीमतों से सुरक्षित रखे. ये वो निर्णय है जो कच्चे तेल की कीमतों के अनुसार बार बार बदला जा सकता है. जब कच्चे तेल की कीमतें फिर से बढ़ेंगी तो फिर से एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई जा सकती है. ये कोई सलाह नहीं बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी है जिसे सरकार को निभाना ही होगा यदि चुनावों में पुनः जीत दर्ज करनी है. अन्यथा जनता अपना हिसाब अवश्य करेगी.

अभी भी समय है. यदि हम सब अपनी अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह कर लें तो इस गंभीर समस्या से निजात पायी जा सकती है अन्यथा ईश्वर ही मालिक है और जनता जनार्दन. ईश्वर सब को सद्बुद्धि दे.
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(updated on October 11th, 2018)

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